
धीरेंद्र वर्मा
शारदीय नवरात्रि 2025 का पांचवां दिन मां स्कंदमाता की आराधना को समर्पित है। नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और पांचवें दिन भक्त माता दुर्गा के पांचवें रूप स्कंदमाता की उपासना करते हैं।
स्कंदमाता का नाम दो शब्दों से बना है – स्कंद और माता। स्कंद का अर्थ है भगवान कार्तिकेय, जो शिव-पार्वती के पुत्र हैं, और माता का अर्थ है मां। इस प्रकार स्कंदमाता, माता पार्वती का ही एक रूप हैं।
स्वरूप और महत्व
मां स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। वे एक हाथ में भगवान कार्तिकेय को धारण करती हैं, दो हाथों में कमल का पुष्प लिए रहती हैं और चौथे हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। उनका वाहन शेर है, वहीं मयूर भी उनका वाहन माना गया है। माता का रंग शुभ्र है और वे कमल पर विराजित रहती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है।
स्कंदमाता विशुद्धि चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। सच्चे मन से इनकी पूजा करने से यह चक्र जागृत होता है और साधक को विशेष सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
कथा और जन्म की मान्यता
मान्यता है कि माता सती के देहत्याग के बाद भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए थे। इसी दौरान राक्षस तारकासुर और सुरपद्मन ने देवताओं पर अत्याचार शुरू कर दिए। ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त होने के कारण उन्हें केवल शिवपुत्र ही मार सकता था।
नारद जी की सलाह पर माता पार्वती ने घोर तपस्या कर शिव से विवाह किया। विवाह के बाद उनकी ऊर्जा से एक बीज उत्पन्न हुआ जिसे गंगा और सरवाना झील में सुरक्षित रखा गया। वहीं से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ।
कार्तिकेय ने बड़े होकर देवताओं से मिले शस्त्रों के बल पर राक्षसों का संहार किया। इसी कारण माता दुर्गा को स्कंदमाता यानी कार्तिकेय की माता कहा जाता है।
पूजा का महत्व
मान्यता है कि स्कंदमाता की उपासना से संतान सुख की प्राप्ति होती है। उनके मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है:
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः
इस मंत्र के जप से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
