
धीरेंद्र वर्मा
नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। धर्मग्रंथों के अनुसार, जब दैत्यों का अत्याचार बढ़ गया और महिषासुर ने स्वर्गलोक पर अधिकार करने का प्रयास किया, तब देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी। तीनों देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिन्होंने चंद्रघंटा का रूप धारण किया।
भगवान शंकर ने उन्हें त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने घंटा और सूर्य ने तलवार तथा तेज प्रदान किया। सिंह पर आरूढ़ मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।
मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण उनका यह नाम पड़ा। इनके शरीर का रंग स्वर्ण समान तेजस्वी है और दस भुजाओं में विविध अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं। इनकी युद्ध मुद्रा और घंटे की भयंकर ध्वनि से असुर और राक्षस भयभीत रहते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की उपासना से साधक के जीवन में वीरता, निर्भयता, सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। साथ ही, उन्हें अलौकिक अनुभूतियों का भी अनुभव होने लगता है।
मां चंद्रघंटा के प्रमुख मंत्र:
- “पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥” - “या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
पंडितों का कहना है कि नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की साधना से भक्त सभी संकटों से मुक्त होकर कल्याण और परम पद के अधिकारी बन सकते हैं।
