

एलायंस टुडे ब्यूरो
झांसी/भरतपुर। जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां उम्मीदें धुंधली पड़ने लगती हैं। लेकिन कभी-कभी एक फोन कॉल, एक इत्तेफाक सालों पुरानी बिछड़ी हुई मोहब्बत और रिश्तों को फिर से जोड़ देता है। कुछ ऐसा ही हुआ झांसी के चितगुआं गांव की रहने वाली रजनी उर्फ रानी झा और उनके बच्चों के साथ, जब 17 साल बाद भरतपुर के एक आश्रम से आई कॉल ने उनके जीवन को एक बार फिर रोशनी से भर दिया।
2008 में घर से निकल गई थीं रजनी झा, 17 साल तक कोई सुराग नहीं
साल 2008 में रजनी झा अपने तीन छोटे बच्चों और पति को पीछे छोड़कर झांसी स्थित अपने घर से अचानक निकल गई थीं। तब उनका बेटा रोहित महज 6 साल का था, बेटी सीतु 5 की और सबसे छोटी शिवानी केवल 3 साल की थी। परिवार ने उनकी खूब तलाश की, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन वर्षों तक कोई सुराग नहीं मिला।
बेटे रोहित बताते हैं, “पापा ड्राइवर थे, मां के जाने के बाद उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे हम सबने उम्मीद छोड़ दी थी। लोग कहते थे कि क्या पता वो अब भी जिंदा हैं या नहीं। लेकिन दिल के किसी कोने में हमेशा ये ख्वाहिश थी कि एक दिन मां मिल जाएं।”
एक कॉल ने बदली ज़िंदगी – “आपकी मां ‘अपना घर’ आश्रम में हैं”
3 अगस्त 2025 को अचानक रोहित के पास राजस्थान के भरतपुर स्थित ‘अपना घर’ आश्रम से कॉल आया। कॉल करने वाले ने बताया कि वहां एक महिला हैं, जिनकी मानसिक स्थिति पहले ठीक नहीं थी, लेकिन अब वो धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं। नाम पूछने पर उन्होंने खुद को “रानी झा” बताया है और झांसी से जुड़ी कुछ बातें भी की हैं। आश्रम प्रशासन ने परिवार से वीडियो कॉल पर रानी झा की बात कराई। रजनी के देवर मुकेश ने उनकी पहचान की पुष्टि की और फिर बेटे रोहित, बेटी सीतु और दामाद विकास तुरंत भरतपुर के लिए रवाना हो गए।
मां-बेटी का मिलन: भावनाओं का सैलाब
भरतपुर के बझेरा स्थित ‘अपना घर’ आश्रम में जैसे ही रजनी झा की बेटी सीतु और बेटा रोहित पहुंचे, तो मां को देखते ही सीतु फूट-फूट कर रोने लगी और उनसे लिपट गई। मां-बेटी दोनों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। यह नजारा देखकर वहां मौजूद सभी की आंखें नम हो गईं। रोहित ने बताया, “हमने अपनी बचपन की तस्वीरें मां को दिखाईं। बहन ने कहा – देखो मां, ये मैं हूं, ये भाई रोहित और ये सबसे छोटी शिवानी। मां थोड़ी देर चुप रहीं, फिर आंसुओं के साथ हमें पहचान लिया।”
आश्रम की देखभाल और मानसिक इलाज से हुई सुधार
‘अपना घर’ आश्रम के सचिव बसंत लाल गुप्ता ने बताया कि रजनी झा को साल 2018 में भरतपुर के आश्रम में लाया गया था। इससे पहले वह बीकानेर स्थित नारी निकेतन में 2012 से रह रही थीं। आश्रम में पहुंचने पर उनकी मानसिक स्थिति खराब थी, लेकिन इलाज और देखभाल से धीरे-धीरे सुधार होने लगा। फिर एक दिन रजनी ने झांसी और अपने बच्चों का ज़िक्र किया। इसी आधार पर उनकी पहचान की प्रक्रिया शुरू की गई। गुप्ता ने बताया, “हमने उनकी बातों को गंभीरता से लिया और खोजबीन शुरू की। 3 अगस्त को रजनी के देवर मुकेश से संपर्क हो गया। वीडियो कॉल पर परिवार की बात करवाई गई, जिससे उनकी पहचान पक्की हो सकी।”
अब परिवार के साथ नई शुरुआत
गुरुवार को रजनी झा को उनके परिजन झांसी वापस ले गए। उनके बेटे रोहित ने कहा, “अब मां को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। जो साल हमने बिना मां के काटे, अब उसे दोबारा नहीं दोहराना चाहते।” वहीं आश्रम प्रशासन ने भी इस पुनर्मिलन को एक मिसाल बताया और उम्मीद जताई कि और भी ऐसे परिवार अपने बिछड़े सदस्यों को वापस पा सकें।
