
लखनऊ। “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा” यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दिलों में आज़ादी की अलख जगाने वाला उद्घोष था। इस ऐतिहासिक नारे के प्रणेता, महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की आज जयंती है। इस अवसर पर आइए जानते हैं उस महान व्यक्तित्व के बारे में, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और नई ऊर्जा दी।
23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जन्मे बाल गंगाधर तिलक बचपन से ही तेजस्वी, अनुशासित और राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। उनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक संस्कृत के विद्वान और शिक्षक थे, जबकि माता पार्वती बाई धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। शिक्षा के साथ-साथ तिलक ने शारीरिक व्यायाम को भी जीवन का हिस्सा बनाया और आगे चलकर बीए तथा कानून की पढ़ाई पूरी की।
हालांकि परिवार चाहता था कि वे वकालत कर सुख-संपन्न जीवन जिएं, लेकिन तिलक ने देशसेवा का मार्ग चुना। उन्होंने 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और बाद में फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना कर शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का बीड़ा उठाया।
लोकमान्य तिलक ने यह समझ लिया था कि केवल भाषणों से देश नहीं जागेगा। इसलिए उन्होंने सार्वजनिक गणेश उत्सव और शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की, ताकि लोगों में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक एकता और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना पैदा हो। यही कारण था कि जनता ने उन्हें प्रेम और सम्मान से ‘लोकमान्य’ की उपाधि दी।
उनकी निर्भीक लेखनी भी अंग्रेजी हुकूमत के लिए बड़ी चुनौती बन गई। उन्होंने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेज़ी) समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की खुलकर आलोचना की और भारतीयों में स्वाभिमान जगाया।
तिलक की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया और छह वर्ष के लिए बर्मा (अब म्यांमार) की मांडले जेल भेज दिया। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘गीता रहस्य’ जैसी महान कृति लिखी, जो आज भी भारतीय दर्शन और कर्मयोग की महत्वपूर्ण व्याख्या मानी जाती है।
महात्मा गांधी ने लोकमान्य तिलक को “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें “भारतीय क्रांति का जनक” बताया। यह सम्मान उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण और संघर्ष का प्रमाण है।
1 अगस्त 1920 को मुंबई में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उनका अमर नारा आज भी हर भारतीय को देशभक्ति, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक केवल एक नेता नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वह चेतना थे, जिसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े देश को आज़ादी का सपना देखने का साहस दिया।
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