

अनुपम चंद्र
आज मैंने सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी देखी। गाड़ी पुरानी थी, लेकिन उसे देखकर नजरें कुछ पल के लिए ठहर गईं। आसपास से गुजरती चमचमाती आधुनिक कारों के बीच वह कार जैसे किसी दूसरे दौर की कहानी सुना रही थी। उसके डिजाइन में वह चमक-दमक नहीं थी, जो आज की कारों में दिखाई देती है, लेकिन उसके भीतर एक अलग ही रुतबा था। वह थी हिंदुस्तान एम्बेसडर।
कुछ गाड़ियां सिर्फ सफर का साधन होती हैं, लेकिन कुछ गाड़ियां अपने समय की पहचान बन जाती हैं। एम्बेसडर ऐसी ही कार थी। आज भले ही यह कार सड़कों पर बहुत कम दिखाई देती हो, लेकिन कभी ऐसा भी दौर था जब देश की सत्ता, सरकारी दफ्तर और आम भारतीय की कल्पना में एम्बेसडर का एक खास स्थान था।
1958 में भारतीय सड़कों पर उतरने वाली एम्बेसडर का रिश्ता ब्रिटेन की Morris Oxford Series III से जुड़ा था। हिंदुस्तान मोटर्स ने इसके आधार पर भारत में इसका उत्पादन शुरू किया। पश्चिम बंगाल के उत्तरपाड़ा स्थित कारखाने में इसका सफर शुरू हुआ और करीब 56 वर्षों तक यह कार भारतीय सड़कों का हिस्सा बनी रही। 2014 में इसका उत्पादन बंद हुआ।
लेकिन एम्बेसडर की कहानी केवल एक कार के बनने और बंद होने की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है, जहां कार सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि सामाजिक हैसियत और प्रभाव का प्रतीक भी हुआ करती थी।
कभी एम्बेसडर खरीदना आसान नहीं था
आज अगर कोई व्यक्ति कार खरीदना चाहता है तो उसके सामने दर्जनों कंपनियों और सैकड़ों मॉडल के विकल्प मौजूद हैं। लेकिन कुछ दशक पहले भारत का ऑटोमोबाइल बाजार इतना बड़ा नहीं था।
एम्बेसडर की मांग इतनी अधिक थी कि कई दौर में इसकी बुकिंग के बाद वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था। कहा जाता है कि 1970 और 1980 के दशक में इसका वेटिंग पीरियड कई वर्षों तक पहुंच जाता था।
उस समय किसी परिवार के घर के बाहर एम्बेसडर खड़ी होना सिर्फ यह नहीं बताता था कि परिवार के पास कार है। वह अपने साथ एक सामाजिक रुतबा भी लेकर आती थी।
सत्ता की कार
एम्बेसडर का सबसे दिलचस्प रिश्ता भारतीय सत्ता से रहा प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, वरिष्ठ नौकरशाहों और सरकारी अधिकारियों की आधिकारिक सवारी के तौर पर इस कार ने दशकों तक भारतीय सत्ता के गलियारों से लेकर जिला मुख्यालयों तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
काली या सफेद एम्बेसडर के ऊपर लगी लाल बत्ती उस दौर की तस्वीर का लगभग अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी। सड़क पर दूर से आती एम्बेसडर और उसके ऊपर लगी लाल बत्ती देखकर लोग समझ जाते थे कि कोई बड़ा अधिकारी या नेता गुजर रहा है।
यही वजह है कि एम्बेसडर धीरे-धीरे सिर्फ कार नहीं रही। वह भारतीय सरकारी व्यवस्था और सत्ता संस्कृति का प्रतीक बन गई।
जब बदला सत्ता की सवारी का दौर
लंबे समय तक देश के प्रधानमंत्रियों की आधिकारिक गाड़ियों में एम्बेसडर का दबदबा रहा। लेकिन समय के साथ सुरक्षा की जरूरतें बदलने लगीं और आधुनिक, अधिक सुरक्षित वाहनों ने उसकी जगह लेनी शुरू कर दी।
2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरक्षा कारणों से एम्बेसडर के बजाय बख्तरबंद BMW 7-Series का इस्तेमाल शुरू किया। यह बदलाव केवल एक प्रधानमंत्री की कार बदलने की घटना नहीं थी। यह भारतीय राजनीति और सरकारी परिवहन में बदलते दौर का संकेत भी था।
इसके बाद धीरे-धीरे एम्बेसडर का सरकारी काफिलों में दिखना कम होता चला गया। आराम ऐसा कि पीछे बैठने वाला भूल जाए कि सड़क कैसी है. एम्बेसडर की एक खासियत उसकी पिछली सीट थी।
आज कारों में आराम के लिए तरह-तरह की तकनीक, इलेक्ट्रिक सीटें और आधुनिक फीचर्स मिलते हैं। लेकिन एम्बेसडर का आराम किसी तकनीक का कमाल नहीं था। उसकी बड़ी सीटें, पर्याप्त जगह और लंबा व्हीलबेस पीछे बैठने वालों को एक अलग तरह का आराम देते थे।
भारतीय सड़कों की खराब हालत को देखते हुए इसका सस्पेंशन भी इसकी बड़ी ताकत था। यही कारण था कि इसे लंबे समय तक ‘भारतीय सड़कों का राजा’ कहा जाता रहा।
इसके भारी-भरकम बॉडी डिजाइन को लेकर भी तरह-तरह के किस्से मशहूर थे। लोग मजाक में कहते थे कि एम्बेसडर से टक्कर होने पर सामने वाली गाड़ी ज्यादा परेशान होगी।
टैक्सी से लेकर सरकारी दफ्तर तक
एम्बेसडर की एक और पहचान टैक्सी के रूप में बनी। खासकर कोलकाता जैसी जगहों पर पीली एम्बेसडर टैक्सियां शहर की पहचान का हिस्सा बन गई थीं। इसकी मजबूती, विशाल केबिन और खराब सड़कों पर चलने की क्षमता ने इसे टैक्सी के रूप में भी लोकप्रिय बनाया।
2013 में BBC के चर्चित कार्यक्रम Top Gear ने भी एम्बेसडर को दुनिया की मशहूर टैक्सियों के संदर्भ में खास पहचान दी। यह उस कार के लिए एक दिलचस्प अंतरराष्ट्रीय सम्मान था, जिसे भारत में लोग दशकों से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानते आए थे।
फिर समय बदल गया
लेकिन हर कहानी का एक अंत होता है। भारत में उदारीकरण के बाद विदेशी और नई भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियां तेजी से आईं। कारों में डिजाइन, माइलेज, सुरक्षा, तकनीक और सुविधाओं की मांग बढ़ने लगी।
नई पीढ़ी को छोटी, ज्यादा माइलेज देने वाली और आधुनिक कारें पसंद आने लगीं। एम्बेसडर का पुराना डिजाइन और तकनीक धीरे-धीरे बाजार की बदलती जरूरतों के सामने कमजोर पड़ने लगी।
आखिरकार 2014 में हिंदुस्तान मोटर्स ने उत्तरपाड़ा प्लांट में एम्बेसडर का उत्पादन बंद कर दिया और इसके साथ भारतीय सड़कों से एक ऐसा अध्याय लगभग खत्म हो गया, जिसे दोबारा उसी रूप में लिखना शायद संभव नहीं है।
आज सड़क पर दिखे तो सिर्फ कार मत समझिएगा
आज सड़क पर एम्बेसडर दिखाई देती है तो शायद युवा पीढ़ी के लिए वह सिर्फ एक पुरानी कार हो। लेकिन जिसने 1970, 1980 या 1990 के दशक का भारत देखा है, उसके लिए यह कार बहुत कुछ है।
यह उस समय की याद है जब सरकारी दफ्तरों के बाहर एम्बेसडर खड़ी रहती थी। यह उन टैक्सियों की याद है, जिनमें बैठकर लोगों ने शहरों का सफर किया. यह उन परिवारों की याद है, जिन्होंने वर्षों इंतजार के बाद अपनी पहली कार खरीदी और यह उस भारत की भी याद है, जहां सड़क पर चलती एक कार देखकर ही उसके भीतर बैठे व्यक्ति की हैसियत का अंदाजा लगाने की कोशिश की जाती थी। आज जब मैंने सड़क पर वह पुरानी एम्बेसडर देखी, तो कुछ पल के लिए लगा कि सड़क पर सिर्फ एक कार नहीं चल रही थी।
एक पूरा दौर चल रहा था
वह दौर, जिसमें कारें इतनी आधुनिक नहीं थीं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें बहुत गहरी थीं। एम्बेसडर अब उत्पादन में नहीं है, लेकिन भारतीय ऑटोमोबाइल इतिहास में उसका इंजन आज भी चलता है यादों में, तस्वीरों में और उन लोगों की बातों में, जिन्होंने कभी इसकी पिछली सीट पर बैठकर भारत को बदलते हुए देखा था।
शायद यही किसी कार की सबसे बड़ी कामयाबी है उसका सड़क से गायब हो जाना, लेकिन लोगों की यादों से कभी न मिटना।

अनुपम चंद्र ( Anupam Chandra ) एक ग्राउंड रिपोर्टर और कंटेंट लेखक हैं। वे डिजिटल मीडिया की तकनीकी बारीकियों और कंटेंट क्रिएशन के नए तौर-तरीकों की गहरी समझ रखते हैं।



