
लखनऊ। उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग ने गौशालाओं को केवल गोवंश संरक्षण तक सीमित रखने के बजाय उन्हें आत्मनिर्भर, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मजबूत केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार को इंदिरा भवन स्थित आयोग के सभागार में उद्यमियों, नवाचारी किसानों, गोसेवी संस्थाओं और गौशाला संचालकों के साथ आयोजित संवाद में “गोबर से ऊर्जा, गोमूत्र से मूल्यवर्धन और नवाचार से आय” के मॉडल पर विस्तृत चर्चा हुई।
बैठक की अध्यक्षता आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्त ने की। इस दौरान आयोग के सदस्य राजेश सिंह सेंगर, दीपक गोयल और रमाकांत उपाध्याय समेत कई विशेषज्ञ और उद्यमी मौजूद रहे।
संवाद में विशेषज्ञों ने बताया कि यदि करीब 200 गायों वाली गौशाला में दूध, गोबर और गोमूत्र का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यवर्धन किया जाए तथा बायोगैस, जैविक खाद, प्राकृतिक खेती के इनपुट और अन्य गो-आधारित उत्पाद तैयार किए जाएं, तो सालाना लगभग ₹2 करोड़ तक की आय का मॉडल विकसित किया जा सकता है। यह प्रस्तुति Global Confederation of Cow-Based Industries (GCCI) के सचिव पुरीष कुमार ने दी।
गुजरात के बनासकांठा से आए देवाराम पुरोहित ने गोमूत्र के संग्रहण और वैज्ञानिक प्रसंस्करण के अपने सफल मॉडल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इससे ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ रही है और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा मिल रहा है।
वहीं, श्री ग्राम धाम गौशाला, सिद्धपुरा (लखनऊ) के संचालक एवं पूर्व पुलिस उपाधीक्षक शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने बैल-आधारित विद्युत उत्पादन मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से विकसित यह प्रयोग स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा का प्रभावी विकल्प बन सकता है।
रूरल हब इनोवेशंस लिमिटेड के गौरव गुप्ता ने ग्रामीण युवाओं को तकनीक, बाजार और उद्यमिता से जोड़ने पर जोर दिया, जबकि Pay Amrit Organic FPO के निदेशक प्रवीण मिश्रा ने सुझाव दिया कि गो-आधारित सर्कुलर बायोइकोनॉमी और प्राकृतिक खेती को स्कूलों एवं कॉलेजों की शिक्षा से जोड़ा जाए, ताकि नई पीढ़ी इन अवधारणाओं को अपनाए।
बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि भविष्य की गौशालाएं केवल संरक्षण केंद्र नहीं, बल्कि ‘ग्रामीण सर्कुलर बायोइकोनॉमी हब’ बन सकती हैं। यहां गोबर से बायोगैस और जैविक खाद, गोमूत्र से मूल्यवर्धित उत्पाद तथा अन्य गो-आधारित उत्पाद तैयार कर ऊर्जा, रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्त ने कहा कि अब समय आ गया है कि गौशालाओं को अनुदान आधारित व्यवस्था से आगे बढ़ाकर नवाचार, उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। उनका कहना था कि प्रदेश की गौशालाओं में हो रहे नवाचारों को देशभर के सफल मॉडलों से जोड़कर गोवंश संरक्षण के साथ रोजगार और आत्मनिर्भरता का स्थायी मॉडल तैयार किया जाएगा।
बैठक के अंत में प्रतिभागियों ने विश्वास जताया कि “गोबर से ऊर्जा, गोमूत्र से मूल्यवर्धन और नवाचार से आय” का मॉडल उत्तर प्रदेश की गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार, प्राकृतिक खेती और सतत विकास को भी नई दिशा देगा।
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