
धीरेन्द्र वर्मा
सनातन धर्म की विविध यौगिक कथाएँ हमें भगवान शिव की अनोखी करुणा, भोलाभाव और भक्तवत्सलता का गहन बोध कराती हैं। इन कथाओं में न केवल भगवान शिव की महिमा उजागर होती है, बल्कि विष्णु की रणनीतिक बुद्धिमत्ता भी एक नया दृष्टिकोण देती है। ऐसी ही एक विलक्षण और प्रेरणादायी कथा है गजेंद्र और महादेव की — जिसमें शिव, अपने एक भक्त के भोले आग्रह पर स्वयं उसकी देह में समा जाते हैं, और पूरे ब्रह्मांड को उनकी अनुपस्थिति खलने लगती है।
गजेंद्र असुर और उसकी तपस्या
यह कथा प्रारंभ होती है गजेंद्र नामक एक असुर से, जो स्वभाव से आक्रामक भले था, परंतु भगवान शिव का परम भक्त भी था। उसने वर्षों तक कठिन तपस्या की और अंततः शिवजी को प्रसन्न कर उन्हें साक्षात प्रकट होने पर विवश कर दिया। जब शिवजी प्रकट हुए, तो गजेंद्र ने एक विशेष वरदान माँगा — “जब भी मैं आपको पुकारूँ, आपको मेरे पास आना होगा।”
शिव ने अपनी स्वाभाविक भोलाभक्ति के चलते यह वरदान उसे दे दिया।
इसके बाद गजेंद्र छोटी-छोटी बातों पर भी शिव को बुलाने लगा — कभी रास्ते की बाधा के लिए, कभी युद्ध में सहायता के लिए, कभी भोजन में स्वाद की कमी पर। शिव हर बार बिना विलंब के प्रकट हो जाते। यह शिव की भक्ति में डूबे हुए भोले स्वभाव की मिसाल थी।
नारद की युक्ति और गजेंद्र की चाल
सभी लोकों में भ्रमण करने वाले चतुर और शरारती ऋषि नारद ने जब यह दृश्य देखा, तो उन्हें गजेंद्र की यह हरकत अनुचित लगी। उन्होंने गजेंद्र को सलाह दी:
“तुम क्यों बार-बार शिव को बुलाते हो? क्यों न उन्हें अपने अंदर ही बसा लो ताकि वे हर समय तुम्हारे साथ रहें?”
गजेंद्र को यह विचार बहुत भाया। उसने पुनः शिव की तपस्या की और जब महादेव प्रकट हुए, तो उनसे निवेदन किया:
“हे प्रभु! आप मेरे भीतर प्रविष्ट हो जाएँ और वहीं वास करें। बाहर आने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।”
शिव, अपने सहज और निष्कलंक स्वभाव से प्रेरित होकर, एक लिंग रूप में गजेंद्र के भीतर प्रविष्ट हो गए।
त्रिलोक में शिव की अनुपस्थिति
समय बीतता गया, लेकिन अब शिव किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे।
त्रिलोक — स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल — उनकी अनुपस्थिति से अशांत हो गया।
भूत, गण, योगी, देवता — सभी ने उन्हें हर दिशा में ढूंढा, परंतु उनका कोई अता-पता नहीं चला।
अंततः, जब स्थिति विकट हो गई और शिव की अनुपस्थिति से ब्रह्मांडीय संतुलन बिगड़ने लगा, तो सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।
विष्णु ने दिव्यदृष्टि से देखा और बताया:
“शिव तो गजेंद्र के अंदर हैं। वही उन्हें बाहर नहीं आने दे रहा।”
अब समस्या थी — शिव को गजेंद्र के भीतर से बाहर कैसे लाया जाए?
विष्णु की योजना: भक्ति का जाल
विष्णु, जो सदा समाधान के देवता माने जाते हैं, उन्होंने एक योजना बनाई — “शिव को बाहर लाने के लिए भक्तिभाव जगाना होगा।”
उन्होंने देवताओं को शिवभक्तों का वेश धारण करने को कहा।
देवगण वेश बदलकर गजेंद्र के राज्य में पहुँचे और वहाँ भक्ति के गीत गाने लगे। उनके भजनों और स्तुतियों में इतनी आत्मा और भावना थी कि गजेंद्र, जो स्वयं शिवभक्त था, अति प्रसन्न हुआ और उन्हें दरबार में आमंत्रित किया।
शिवभक्तों के इस दल ने दरबार में आकर गाने और नृत्य द्वारा शिव का महिमा गायन प्रारंभ किया।
“जय शिव शंकर, भोलेनाथ की जय”, “हर हर महादेव” जैसे मंत्र गूंज उठे।
शिव का प्रकट होना और गजेंद्र का अंत
शिव, जो गजेंद्र के भीतर वास कर रहे थे, भक्तों की यह पुकार और स्तुति सह नहीं पाए।
उनका भक्तिपूर्ण स्वभाव जाग उठा।
वह इतने भावविभोर हो उठे कि उन्होंने स्वयं को गजेंद्र के शरीर से बाहर निकाल लिया — इतना बलपूर्वक कि गजेंद्र के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
शिव ने बाहर आते ही सभी देवताओं को दर्शन दिए और त्रिलोक में पुनः संतुलन लौट आया।
गजेंद्र की कथा यही समाप्त नहीं होती — वह शिव के इस अनुग्रह को समझ गया और अंततः मोक्ष प्राप्त कर दिव्य लोक को प्राप्त हुआ।
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