

कविता वर्मा
शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। रविवार को महासप्तमी के अवसर पर देशभर के देवी मंदिरों में भक्तों ने विधि-विधान से माता की आराधना की। मान्यता है कि इस दिन मां कालरात्रि की पूजा करने से भक्तों को समस्त भय और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है जिसमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इनमें सातवां स्वरूप मां कालरात्रि का है, जिन्हें शुभंकारी भी कहा जाता है।
मां कालरात्रि का स्वरूप
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कालरात्रि का शरीर घने अंधकार की भांति काला है। उनके बिखरे हुए केश और गले में विद्युत जैसी चमकती माला है। चार भुजाओं वाली माता गर्दभ (गधे) पर सवार रहती हैं। उनके एक हाथ में लोहे का कांटेदार अस्त्र, दूसरे में खड्ग (कटार), तीसरा हाथ वरमुद्रा और चौथा हाथ अभयमुद्रा में रहता है। माता को गुड़ का भोग और लाल रंग के वस्त्र अर्पित करना विशेष शुभ माना जाता है।
शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज का वध
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय दैत्य शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी, जिसके बाद माता पार्वती ने दुर्गा रूप धारण किया और राक्षसों का संहार किया।
रक्तबीज को ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि उसके खून की प्रत्येक बूंद धरती पर गिरते ही नए रक्तबीज को जन्म देगी। ऐसे में देवी ने कालरात्रि का रूप धारण कर रक्तबीज का वध किया और उसके रक्त को पान कर असुरों का संहार कर दिया।
पूजा का महत्व
मान्यता है कि नवरात्रि के सातवें दिन पूजा करने से सहस्रार चक्र जाग्रत होता है, जिससे साधक को ब्रह्मांड की अद्भुत सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मां कालरात्रि की उपासना से ग्रह-बाधाएं, शत्रु भय, रात्रि भय, अग्नि और जल से होने वाले संकट दूर हो जाते हैं।
मंत्र
मां कालरात्रि की आराधना का मुख्य मंत्र है:
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
भक्तों का विश्वास है कि इस मंत्र के जाप से दुख, भय और अंधकार का नाश होता है तथा जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं।
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