
धीरेंद्र वर्मा
शारदीय नवरात्र का छठा दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित होता है। इस दिन भक्त बड़े धूमधाम से मां की पूजा-अर्चना कर व्रत रखते हैं। मान्यता है कि मां कात्यायनी की उपासना से भक्तों को अद्भुत शक्ति और विजय प्राप्त होती है। यही कारण है कि इन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ भी कहा जाता है।
मां कात्यायनी का स्वरूप
मां कात्यायनी का रूप अत्यंत तेजस्वी और ज्योतिर्मय बताया गया है। उनके चार भुजाएं हैं –
दाईं ओर की ऊपरी भुजा अभय मुद्रा में नीचे की भुजा वर मुद्रा में बाईं ओर की एक भुजा में तलवार और दूसरी में कमल का पुष्प सुशोभित है।
सिंह पर सवार यह दिव्य स्वरूप मां दुर्गा के पराक्रम और महाशक्ति का प्रतीक है।
जन्म कथा
पुराणों के अनुसार महर्षि कात्यायन ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि देवी स्वयं उनकी पुत्री के रूप में जन्म लें। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ने वचन दिया और आश्विन माह की कृष्ण चतुर्दशी को उनके घर प्रकट हुईं। इसी कारण देवी को कात्यायनी नाम से जाना गया।
महिषासुर वध की कथा
उस समय असुरराज महिषासुर के अत्याचार से तीनों लोक त्रस्त हो चुके थे। उसे वरदान प्राप्त था कि कोई पुरुष उसका वध नहीं कर सकता। तब त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज से मां कात्यायनी की रचना की।
महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले उनकी विधिवत पूजा की। मान्यता है कि सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक मां की आराधना के बाद, दशमी के दिन मां कात्यायनी ने महिषासुर का संहार कर देवताओं और लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया।
विशेष महत्व
मां कात्यायनी को शहद अति प्रिय है। भक्त इस दिन शहद का भोग लगाते हैं।
पूजा में लाल और सफेद वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
ब्रज की गोपियों ने भी भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए मां कात्यायनी की आराधना की थी।
आराधना मंत्र
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।
(अर्थात – ओमकार के समान शुद्ध स्वरूप वाली देवी कात्यायनी हमें सदैव अपनी कृपा और शुभ दृष्टि प्रदान करें।)
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