
मोनू शर्मा
उरई। लविधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही जिले की सियासत में हलचल तेज हो गई है। चुनाव लड़ने के इच्छुक दावेदार जहां अपनी-अपनी राजनीतिक गोटियां बिछाने में जुट गए हैं, वहीं प्रमुख राजनीतिक दल भी मतदाताओं को साधने के लिए मुद्दों और रणनीतियों को धार देने में लगे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा जहां हिंदुत्व, धार्मिक मुद्दों और अपने कार्यकाल के विकास कार्यों को लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में है, वहीं मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी पीडीए और कथित ‘वोट चोरी’ जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा को घेरने की कोशिश में है।
इन राजनीतिक दावों और मुद्दों के बीच जालौन के मतदाताओं का रुख किस ओर जाएगा, फिलहाल यह कहना मुश्किल है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की तीनों सीटों में से उरई-जालौन और माधौगढ़ पर भाजपा ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की थी, जबकि कालपी सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी। हालांकि बाद में राज्यसभा चुनाव के दौरान कालपी के सपा विधायक विनोद चतुर्वेदी की क्रॉस वोटिंग और उनके भाजपा के करीब आने से जिले का राजनीतिक समीकरण काफी बदल गया है। ऐसे में आगामी चुनाव में कालपी, माधौगढ़ और उरई-जालौन तीनों सीटों पर पुराने समीकरणों की परीक्षा होगी।
कालपी विधानसभा : कागज उद्योग और बेरोजगारी के बीच जातीय समीकरण
220 कालपी विधानसभा में वर्ष 2022 में 3,95,623 मतदाता और 516 मतदान केंद्र थे। क्षेत्र की राजनीति में विकास के मुद्दे अक्सर जातीय समीकरणों के पीछे दब जाते हैं। पलायन, बेरोजगारी, बदहाल सड़कें और कालपी का दम तोड़ता कागज उद्योग आज भी प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं। दलित, पाल, ब्राह्मण और क्षत्रिय मतदाता यहां महत्वपूर्ण भूमिका में हैं, जबकि निषाद, यादव, मुस्लिम और वैश्य मतदाता भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में रहते हैं। 2022 में सपा के विनोद चतुर्वेदी ने 69,782 वोट हासिल कर भाजपा-निषाद गठबंधन के प्रत्याशी छोटे सिंह को महज 2,816 वोटों के अंतर से पराजित किया था। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और विनोद चतुर्वेदी के भाजपा के साथ आने से आगामी चुनाव में पुराने समीकरण किस रूप में बदलते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। कालपी का कागज उद्योग भी चुनावी मुद्दा बन सकता है। कभी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की पहचान रहा यह उद्योग चाइनीज माल से बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सरकारी सुविधाओं की कमी के बीच लगातार कमजोर हुआ है। कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं या गेस्ट हाउस में तब्दील हो गई हैं। उद्यमियों की शिकायत है कि उन्हें बिजली बिल में अपेक्षित राहत नहीं मिलती और बैंक ऋण की उपलब्धता भी आसान नहीं है। कालपी में इस बार सवाल सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि पुराने राजनीतिक समीकरणों के नए सिरे से बनने का भी है।
माधौगढ़ विधानसभा : पिछड़ेपन और जातीय राजनीति के बीच चुनाव
219 माधौगढ़ विधानसभा को जिले की सबसे पिछड़ी विधानसभा क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां किसानों की समस्याएं, रोजगार का अभाव और क्षेत्र का आर्थिक पिछड़ापन लंबे समय से प्रमुख मुद्दे रहे हैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज के बीच राजनीतिक खींचतान के बीच यह सीट पिछले करीब डेढ़ दशक में पिछड़े वर्ग की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई है। वर्ष 2022 में भाजपा के मूलचंद निरंजन ने बसपा के शीतल कुशवाहा को 34,974 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। 4,44,726 मतदाताओं वाली इस विधानसभा में भाजपा प्रत्याशी को 1,05,231 वोट मिले थे। दलित, ब्राह्मण, क्षत्रिय और कुशवाहा मतदाता यहां प्रमुख हैं, जबकि मुस्लिम,यादव, कुर्मी और वैश्य मतदाता भी चुनावी गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। क्षेत्र में सड़कों को लेकर वर्तमान विधायक मूलचंद निरंजन ने जरूर काम कराया है, लेकिन रोजगार और औद्योगिक विकास का सवाल अब भी कायम है। पंचनद धाम और शुगर मिल जैसे मुद्दे हर चुनाव में चर्चा में आते हैं, लेकिन अब तक इनका स्थायी समाधान नहीं हो सका है। व्यापार और रोजगार के लिहाज से क्षेत्र की स्थिति कमजोर है। यदि इटावा की सीमा से जालौन को बेहतर फोरलेन संपर्क मिलता है और क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ती हैं तो माधौगढ़ की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है। माधौगढ़ में इस बार भी विकास बनाम जातीय समीकरण के बीच मतदाताओं का रुख चुनाव की दिशा तय कर सकता है।
उरई-जालौन : सत्ता की हैट्रिक या बदलाव की दस्तक
221 उरई-जालौन (सु.) विधानसभा जिले की सदर सीट है, लेकिन जिला मुख्यालय होने के बावजूद उरई को अपेक्षित औद्योगिक और शैक्षिक विकास नहीं मिल सका है 4,46,928 मतदाताओं वाली इस आरक्षित सीट पर ओबीसी मतदाताओं की संख्या करीब 1.29 लाख और अनुसूचित जाति मतदाताओं की संख्या करीब 1.15 लाख बताई जाती है। सामान्य वर्ग, मुस्लिम और वैश्य मतदाता भी चुनावी परिणामों पर प्रभाव डालते हैं 2022 में भाजपा के गौरीशंकर वर्मा ने 1,28,644 वोट हासिल कर सपा के पूर्व मंत्री दयाशंकर वर्मा को 37,648 वोटों के अंतर से पराजित किया था। उरई का औद्योगिक क्षेत्र भी क्षेत्र की आर्थिक चुनौतियों का प्रतीक बन चुका है। उद्योगों के भरुआ-सुमेरपुर में स्थानांतरित होने से रोजगार का संकट बढ़ा है। उच्च शिक्षा और बेहतर रोजगार के लिए युवाओं को कानपुर सहित दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। सपा शासनकाल में मेडिकल कॉलेज की स्थापना को क्षेत्र के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी माना गया, लेकिन भाजपा के कार्यकाल में ऐसा कोई बड़ा स्थानीय प्रोजेक्ट सामने नहीं आया जिसे लेकर राजनीतिक रूप से व्यापक चर्चा हो। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा उरई-जालौन में लगातार तीसरी जीत दर्ज कर अपना दबदबा कायम रख पाएगी, या विपक्ष बदले हुए राजनीतिक माहौल में यहां सेंध लगा पाएगा?
तीन सीटें, तीन अलग समीकरण
जालौन की तीनों विधानसभा सीटों की राजनीतिक तस्वीर एक-दूसरे से अलग है। कालपी में बदले हुए दलगत समीकरण और कागज उद्योग का संकट प्रमुख है, माधौगढ़ में पिछड़ापन, किसान, रोजगार और जातीय समीकरण चुनावी राजनीति के केंद्र में हैं, जबकि उरई-जालौन में सत्ता की निरंतरता और विकास का सवाल प्रमुख है। फिलहाल राजनीतिक दल अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान तैयार कर रहे हैं और दावेदार टिकट के लिए सक्रिय हैं। लेकिन अंतिम तस्वीर प्रत्याशियों की घोषणा, गठबंधन की स्थिति और स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ मतदाताओं के अंतिम रुख से ही साफ होगी। जालौन की तीनों सीटों पर इस बार मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि पुराने राजनीतिक समीकरणों और बदलती स्थानीय अपेक्षाओं के बीच भी होगा। चुनावी बिसात बिछ चुकी है। अब किसकी चाल कितनी असरदार होती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।
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