
अनुपम चंद्र
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से मोह यानी अत्यधिक आसक्ति या सांसारिक बंधनों के प्रति अत्यधिक लगाव को जड़ से खत्म करना ही परम शांति और मोक्ष का मार्ग है। सनातन धर्म, गीता, और बौद्ध दर्शन जैसे भारतीय ग्रंथों में मोह को सभी दुखों, चिंताओं और पापों का मूल कारण माना गया है। लेकिन मोह को खत्म करने का अर्थ यह नहीं है कि इंसान अपने परिवार, अपनों या अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ ले। वास्तविक अर्थ यह है कि मोह को अज्ञान (Illusion), ‘ममता’ यानी ‘यह मेरा है’ की भावना, अत्यधिक अपेक्षाओं (Expectations) और अहंकार (Ego) से खत्म किया जाए।
सबसे बड़ा मोह इंसान को अपने शरीर, धन, पद और परिवार से होता है। यह सोचना कि “यह सब मेरा है और हमेशा रहेगा”, यही मोह है। इसी तरह जब हम किसी से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगा लेते हैं, तो मोह का जन्म होता है और उम्मीदें टूटने पर दुख होता है। खुद को कर्ता मानना, यानी यह सोचना कि सब कुछ मैं ही कर रहा हूँ, मोह को और बढ़ाता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से मोह को खत्म करने के लिए सबसे पहले ‘मैं और मेरा’ के भाव, अपेक्षाओं और अहंकार पर विजय पाना आवश्यक है।
श्रीमद्भगवद्गीता में मोह के नाश का मार्ग विवेक और आत्मज्ञान से बताया गया है। संसार की नश्वरता को समझना इसका पहला कदम है। यह याद रखना चाहिए कि इस संसार में सब कुछ परिवर्तनशील और क्षणभंगुर है। जो आज आपका है, वह कल किसी और का था और भविष्य में किसी और का होगा। शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा अमर है। जब इंसान खुद को शरीर के बजाय एक शुद्ध आत्मा के रूप में देखने लगता है, तो सांसारिक वस्तुओं से मोह अपने आप कम होने लगता है।
इसी के साथ निष्काम कर्म योग का मार्ग सामने आता है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्म पर आपका अधिकार है, उसके फल पर नहीं। अपने परिवार, समाज और काम के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी निष्ठा से निभानी चाहिए, लेकिन उनके परिणामों या बदले में कुछ मिलने की उम्मीद को छोड़ देना चाहिए। यही कर्मयोग का मूल भाव है। अपने परिवार के लिए जो भी कर रहे हैं, उसे अपना कर्तव्य (Duty) मानकर करें, न कि कोई उपकार। बदले में सम्मान, प्रेम या आज्ञाकारिता की उम्मीद (Expectation) को शून्य कर दें।
यहीं प्रेम और मोह के बीच का अंतर समझना भी जरूरी है। मोह में स्वार्थ और बांधने की इच्छा होती है, जबकि सच्चे प्रेम में स्वतंत्रता और त्याग होता है। मोह छोड़ना है, प्रेम या कर्तव्य नहीं। प्रेम का अर्थ है सामने वाले के कल्याण की कामना करना और उसे स्वतंत्र छोड़ना, जबकि मोह का अर्थ है सामने वाले को अपनी खुशी का साधन समझना और उसे बांधकर रखने की कोशिश करना।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से जब यही मोह अपनों, परिवार, प्रेमी या प्रेमिका से अत्यधिक लगाव के रूप में पैदा होता है, तो यह भयंकर मानसिक दुख का कारण बन सकता है। जब हम किसी व्यक्ति से इस हद तक जुड़ जाते हैं कि उसके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर पाते, तो यह स्थिति हमारे लिए विनाशकारी हो सकती है। मोह इंसान की बुद्धि को प्रभावित करता है और उसे सही-गलत के बीच का अंतर भुला सकता है।
महाभारत में धृतराष्ट्र का अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति मोह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। धृतराष्ट्र जानते थे कि दुर्योधन गलत है, लेकिन पुत्र-मोह के कारण उन्होंने सही और गलत का अंतर भुला दिया, जिससे पूरे वंश का नाश हो गया।
मोह के साथ भय और असुरक्षा भी जुड़ी होती है। जहाँ मोह होता है, वहाँ हमेशा खोने का डर रहता है। प्रेमी-प्रेमिका या परिवार के प्रति अत्यधिक मोह इंसान को चौबीसों घंटे तनाव, जलन (jealousy) और असुरक्षा की भावना से भर सकता है। मोह में हम सामने वाले पर अपना अधिकार समझने लगते हैं और जब वह हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो गहरा आघात, क्रोध और अवसाद (depression) पैदा हो सकता है।
मोह जीव को संसार के चक्र (जन्म और मृत्यु) में बांधकर रखता है। यह हमें यह भूलने पर मजबूर कर देता है कि हमारा वास्तविक संबंध केवल परमात्मा से है और संसार के लोग तो केवल इस यात्रा के सहयात्री हैं।
भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) में बहुत ही वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाया है कि किसी व्यक्ति या वस्तु का केवल विचार करने मात्र से इंसान किस प्रकार पतन की ओर बढ़ सकता है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(अध्याय २, श्लोक ६२)
अर्थ है कि संसार के विषयों (या प्रिय व्यक्तियों) के बारे में बार-बार सोचने से मनुष्य की आसक्ति (लगाव/Attachment) पैदा हो जाती है। इस आसक्ति से काम (इच्छा/Desire) उत्पन्न होती है कि वह व्यक्ति या वस्तु हमेशा मेरी ही रहे। और जब उस इच्छा में कोई बाधा आती है या वह पूरी नहीं होती, तो उससे क्रोध (Anger) का जन्म होता है।
इसके अगले ही श्लोक में भगवान कृष्ण इस प्रक्रिया के आगे का परिणाम बताते हैं—
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
(अध्याय २, श्लोक ६३)
अर्थ है कि क्रोध आने से मनुष्य में सम्मोह (अंधापन या मूढ़ता/Delusion) पैदा होता है, जिससे वह सही-गलत का विवेक खो देता है। सम्मोह से मनुष्य की स्मृति भ्रमित (Loss of Memory) हो जाती है। वह भूल जाता है कि उसके संस्कार और कर्तव्य क्या हैं। स्मृति नष्ट होने से उसकी बुद्धि का नाश (Destruction of Intellect) हो जाता है और जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, उस मनुष्य का पूर्ण विनाश (Total Ruin) हो जाता है।
इसलिए गीता हमें अपनों से नफरत करना नहीं सिखाती। भगवान कृष्ण परिवार और साथियों से प्रेम करने से नहीं रोकते, बल्कि मोह से मुक्त होने की शिक्षा देते हैं। जब आप अपनों को ईश्वर का रूप मानकर उनसे बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करते हैं, तो वह बंधन नहीं बनता, बल्कि भक्ति बन जाता है।
पारिवारिक जीवन में रहते हुए अनासक्त कैसे रहें
पारिवारिक जीवन में रहते हुए अनासक्त (Detached) होना और ऐसा दृढ़ संकल्प पैदा करना कि मन किसी भी चीज में न फंसे, कर्मयोग की पराकाष्ठा है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यही सिखाया था युद्ध के मैदान में खड़े रहकर, अपनों के सामने होते हुए भी भीतर से पूरी तरह मुक्त रहना। इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मन को उनके बंधन में न फंसने देना है।
इसके लिए ‘ट्रस्टी’ (Trustee) माइंडसेट अपनाया जा सकता है। अपने परिवार, बच्चों, संपत्ति और खुद के शरीर को भी अपना ‘मालिकी हक’ समझना बंद कर दें। यह भाव लाएं कि “यह सब ईश्वर की अमानत है, और मैं केवल इसका मैनेजर या केयरटेकर (Trustee) हूँ।” जब आप किसी बैंक में मैनेजर होते हैं, तो आप करोड़ों रुपयों की देखभाल पूरी ईमानदारी से करते हैं, लेकिन शाम को घर लौटते समय एक भी रुपया न मिलने पर रोते नहीं हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि वह पैसा आपका नहीं था। यही भाव परिवार के साथ रखें उनकी पूरी सेवा करें, लेकिन उन्हें अपनी ‘जागीर’ न समझें।
इसी प्रकार हर क्रिया को “ईश्वर अर्पण” कर देना चाहिए। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, जो भी काम करते हैं—नौकरी करना, बच्चों को पढ़ाना, परिवार की देखभाल—मन ही मन कहें, “हे ईश्वर, यह कर्म मैं आपकी प्रसन्नता के लिए कर रहा हूँ।” जब कर्म का फल सीधे परमात्मा को समर्पित हो जाता है, तो उस कर्म के अच्छे या बुरे परिणाम से आपका मन नहीं बंधता। गीता में इसे ही निष्काम कर्मयोग कहा गया है।
मोह को कम करने के लिए मृत्यु और नश्वरता का दैनिक स्मरण भी उपयोगी है। रोज़ सुबह उठकर या रात को सोते समय 2 मिनट इस शाश्वत सत्य पर विचार करें कि “इस संसार में सब कुछ अस्थायी है। एक दिन यह शरीर भी छूट जाएगा और ये सब लोग भी चले जाएंगे। मैं यहाँ अकेला आया था और अकेला ही जाऊँगा।” इसे ‘शमशान वैराग्य’ नहीं, बल्कि ‘जागृत विवेक’ कहते हैं। जब दिमाग यह स्वीकार कर लेता है कि यहाँ कुछ भी हमेशा रहने वाला नहीं है, तो मोह की पकड़ अपने आप ढीली होने लगती है।
इसके साथ साक्षी भाव (Observer Mode) का अभ्यास भी किया जा सकता है। जब परिवार में कोई विवाद हो, या कोई अत्यधिक सुख-दुख की स्थिति आए, तो तुरंत प्रतिक्रिया (React) न करें। मानसिक रूप से एक कदम पीछे हटें और खुद को एक ‘थर्ड पर्सन’ (तीसरे व्यक्ति) की तरह देखें। जैसे आप कोई फिल्म देख रहे हों। यह अभ्यास आपको चीजों को ठंडे दिमाग से देखने में मदद करता है और भावनाओं के प्रभाव में आकर गलत प्रतिक्रिया देने से बचाता है।
मोह से मुक्ती
भक्ति और समर्पण भी मोह से मुक्ति का महत्वपूर्ण मार्ग है। अपने मन को सांसारिक चीजों में फंसाने के बजाय ईश्वर (या सर्वोच्च चेतना) में लगाएं। जब मन को परमात्मा का उच्च रस (आनंद) मिल जाता है, तो सांसारिक चीजों का फीका रस (मोह) अपने आप छूट जाता है। यह भाव रखें कि “मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ ईश्वर का है और मैं केवल इसका रखवाला (Trustee) हूँ।”
ज्ञानी और संतों की संगति (सत्संग) से मन के भ्रम दूर होते हैं। नियमित ध्यान (Meditation) के जरिए मन शांत होता है और यह समझने की शक्ति मिलती है कि कौन सी चीजें हमारे वश में हैं और कौन सी नहीं।
मन में वज्र जैसा दृढ़ संकल्प और शक्ति एक दिन में नहीं आती। इसे रोज़ की साधना से कमाना पड़ता है। रोज़ 15 मिनट ‘मौन’ और ‘ध्यान’ किया जा सकता है। सुबह या शाम को अकेले बैठें, विचारों को आते-जाते देखें और उनसे जुड़ें नहीं। यह मन की मांसपेशियों को मजबूत करता है।
रोज़ श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के आखिरी कुछ श्लोकों (स्थितप्रज्ञ के लक्षण) को पढ़ना या सुनना भी उपयोगी है। इसके साथ इच्छाशक्ति के छोटे संकल्पों से शुरुआत करें। जैसे “आज मैं पूरे दिन में किसी की बात का बुरा नहीं मानूँगा” या “आज मैं बिना किसी शिकायत के अपना काम करूँगा।” छोटे संकल्प पूरे होने से आत्मबल (Willpower) बढ़ता है।
अंततः यह समझना जरूरी है कि अनासक्त होने का मतलब कठोर या पत्थर दिल होना नहीं है। अनासक्त व्यक्ति भीतर से असीम रूप से शांत होता है, इसलिए वह अपनों को और बेहतर, बिना किसी स्वार्थ के प्रेम कर पाता है।
मोह छोड़ना है, प्रेम या कर्तव्य नहीं। परिवार में रहते हुए परिवार की सेवा करना, अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाना और फिर भी भीतर से यह भाव रखना कि “मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ ईश्वर का है” यही अनासक्ति का मार्ग है।
जब मन अपेक्षाओं, अहंकार, स्वामित्व और भय से मुक्त होने लगता है, तब व्यक्ति संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से ऊपर उठने लगता है। यही भीतर की शांति और आध्यात्मिक मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अनुपम चंद्र ( Anupam Chandra ) एक ग्राउंड रिपोर्टर और कंटेंट लेखक हैं। वे डिजिटल मीडिया की तकनीकी बारीकियों और कंटेंट क्रिएशन के नए तौर-तरीकों की गहरी समझ रखते हैं।



