
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने समाजवादी पार्टी (सपा) के निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक सपा के निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक महापौर अपने किसी भी वित्तीय या प्रशासनिक अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकेंगी।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि इस अवधि में नगर निगम से जुड़े वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों का संचालन जिलाधिकारी (डीएम) और नगर आयुक्त करेंगे। अदालत के इस फैसले के बाद महापौर न तो अपने फंड से कोई खर्च कर सकेंगी और न ही किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई कर पाएंगी।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “महापौर का सदैव महादौर नहीं होता। न्याय हुआ।” उनके इस पोस्ट के बाद मामला राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया।
पूरा मामला जानें
यह मामला लखनऊ नगर निगम के वार्ड संख्या-73 (फैजुल्लागंज) से जुड़ा है। वर्ष 2023 के निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदीप कुमार शुक्ला (टिंकू शुक्ला) को 4,972 वोट मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के ललित किशोर तिवारी को 3,298 मत प्राप्त हुए थे। मतगणना के आधार पर भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया था।
हालांकि, चुनाव परिणाम के बाद 13 मई 2023 को ललित किशोर तिवारी ने अपर जिला जज (निर्वाचन न्यायाधिकरण) की अदालत में चुनाव याचिका दाखिल कर भाजपा प्रत्याशी के निर्वाचन को चुनौती दी। उन्होंने आरोप लगाया कि नामांकन दाखिल करते समय भाजपा प्रत्याशी ने निर्वाचन प्रपत्रों में कानून के तहत आवश्यक कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई थीं, जो चुनावी नियमों का गंभीर उल्लंघन है।
करीब ढाई वर्ष तक चली सुनवाई के बाद निर्वाचन न्यायाधिकरण ने नामांकन पत्र, शपथपत्र और अन्य अभिलेखों की जांच की। अदालत ने माना कि अनिवार्य जानकारियां न देना गंभीर अनियमितता है, जिससे चुनाव की वैधता प्रभावित होती है।
इसके बाद 19 दिसंबर 2025 को न्यायाधिकरण ने भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द करते हुए ललित किशोर तिवारी को वार्ड-73 से निर्वाचित पार्षद घोषित कर दिया।
निर्वाचित घोषित किए जाने के बावजूद ललित किशोर तिवारी को कई महीनों तक शपथ नहीं दिलाई गई। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि न्यायाधिकरण के आदेश के बावजूद भाजपा के पार्षद कार्य करते रहे, जबकि उन्हें अब तक पद की शपथ नहीं दिलाई गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को जिलाधिकारी ने नगर आयुक्त को शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए थे। इसके अलावा 4 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी किए थे।
बाद में 12 मई को हाईकोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर शपथ दिलाने का आदेश दिया था। इस आदेश को भाजपा नेता प्रदीप कुमार शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं होने पर हाईकोर्ट ने महापौर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए थे।
कांग्रेस पार्षद मुकेश सिंह चौहान ने कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह न्यायालय के आदेशों का सम्मान करे। उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करना महापौर को भारी पड़ गया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का यह आदेश साबित करता है कि कानून और न्यायालय से ऊपर कोई नहीं है।
वहीं, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल ने कहा कि वह पिछले तीन दिनों से अस्वस्थ होने के कारण कमांड अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश का पूर्ण रूप से पालन किया जाएगा।
हाईकोर्ट के इस फैसले को स्थानीय निकाय प्रशासन और प्रदेश की राजनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण आदेश माना जा रहा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि सपा के निर्वाचित पार्षद को शपथ कब दिलाई जाती है और इसके बाद महापौर के अधिकार कब बहाल होते हैं।
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