

नई दिल्ली : भारतीय थल सेना के पूर्व प्रमुख, जनरल (रिटायर्ड) मनोज मुकुंद नरवाणे ने हाल ही में उन लोगों की तीखी आलोचना की है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष विराम पर सवाल उठा रहे हैं और युद्ध को एकमात्र समाधान मानते हुए पाकिस्तान के खिलाफ व्यापक सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि युद्ध कोई रोमांटिक बॉलीवुड फिल्म नहीं है, जिसमें वीरता के दृश्य केवल मनोरंजन भर होते हैं। असल ज़िंदगी में युद्ध का दर्द और उसकी पीड़ा बहुत गहरी होती है, जो सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करती है।
रविवार को पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए जनरल नरवाणे ने यह भी कहा कि यदि उन्हें आदेश मिलता तो वह युद्धभूमि में जाने से कभी पीछे नहीं हटते। परंतु उनका मानना है कि कूटनीति के जरिए समस्याओं का हल निकालना हमेशा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने यह विचार इंस्टीट्यूट ऑफ कोस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक संवाद कार्यक्रम के दौरान साझा किए।
जनरल नरवाणे ने सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों की दुर्दशा पर भी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि जब सीमा पर गोलाबारी होती है, तो सबसे अधिक त्रासदी उन लोगों को झेलनी पड़ती है जो सीमा से सटे गांवों में रहते हैं। वहां के बच्चे रातें बंकरों में बिताने को मजबूर हो जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों के लिए युद्ध केवल अखबार की सुर्खियाँ या टीवी बहस का विषय हो सकता है, लेकिन जो लोग अपने परिवार के सदस्यों को युद्ध में खो चुके होते हैं, उनके लिए यह भावनात्मक रूप से स्थायी आघात बन जाता है।
जनरल नरवाणे ने PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) की समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जो युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों और बमबारी झेलने वाले नागरिकों को लंबे समय तक प्रभावित करती है। उन्होंने बताया कि पीड़ित व्यक्ति युद्ध समाप्त होने के कई वर्षों बाद भी घबराहट, बेचैनी, और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से जूझता है, और कई बार उन्हें मनोचिकित्सकीय इलाज की ज़रूरत पड़ती है।
उनके अनुसार, युद्ध किसी फिल्म की तरह कुछ घंटों का एक घटनाक्रम नहीं होता, बल्कि इसके परिणाम दशकों तक प्रभावित करते हैं – मानव जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, और सामाजिक संरचना सब पर इसका दूरगामी असर पड़ता है।
उन्होंने अंत में यह भी जोड़ा कि सैनिक युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, लेकिन वही सच्चे सैनिक युद्ध को अंतिम विकल्प मानते हैं। एक सच्चा राष्ट्रभक्त वही होता है, जो शांति की राह को प्राथमिकता देता है, न कि अंधराष्ट्रवाद के नाम पर युद्ध को महिमामंडित करता है।
जनरल नरवाणे की यह सोच हमें यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि शांति की पहल करना कमजोरी नहीं, बल्कि गहरी समझ, संवेदना और दूरदर्शिता का प्रतीक है। ऐसे वक्त में जब सोशल मीडिया और कुछ वर्ग युद्ध की वकालत करते हैं, उनके जैसे अनुभवी और ज़मीनी हकीकत को जानने वाले सैन्य नेताओं की बातें समाज को एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती हैं।
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